My Legacy

परी का गुल्लक

Pari - परी का गुल्लक

गोल-गोल आंखें मटकाकर और प्यारे-प्यारे टूटे शब्दों को पिरोकर बोलने की कोशिश करती छोटी सी परी यानि मेरी प्यारी बिटिया और उसका गुल्लक। अलग-अलग शक्लों वाला, कभी पिग जैसा, कभी घर जैसा जिसमेँ डालने के लिए पापा, मम्मी, नानी, मासी, बुआ…से कभी कुछ छोटे सिक्के, तो कभी कुछ नोट मिल जाते हैं। वैसे तो, उसे भी अन्य बच्चों की ही तरह गुल्लक से खास लगाव है, जैसे उसमें खजाना भरा हो और लुटेरे उसके आसपास फटक रहे हों और लुटेरों से बचाने की कठिन जिम्मेदारी उसके नन्हें कंधों पर ही हो। नन्हीं सिपाही हमेशा मुस्तैद रहती है, गुल्लक के करीब से भी गुजरने पर चौकन्नी हो जाती है और प्रश्न के साथ ही वह भी तपाक से करीब होती है, “पैसे डाल रही हो क्या?” गुल्लक का मसला इतना गंभीर है कि उसे लेकर किसी तरह की चुहल नामंजूर है, जैसे कुछ पैसे उधार दे दो, छुट्टे पैसे दे दो कल वापस मिल जाएंगे…।

बड़प्पन का बुना तानाबाना और समझदारी का अभिमान बच्चों के अबोध बालपन के समक्ष कई दफे बौना बन कर रह जाता है, ऐसा ही कुछ हुआ उस दिन। नए फ्लैट में शिफ्ट हुए दो दिन बीता था। टीवी का प्लग लगा कर ऑन किया था, तभी बिजली गुल हो गई। हालांकि, कुछ ही देर में बिजली वापस आ गई और बिटिया टीवी ऑन करने दौड़ पड़ी, पर थोड़ी देर में परेशान सी मेरे पास लौटी, “टीवी नहीँ चल रहा, मम्मा”। अब हम दोनों मिल उसे चलाने की कोशिश करने लगे और जल्द ही समझ गए की टीवी बिगड़ गया। नए घर में आने में डिपॉजिट, पैकर्स का खर्च आदि के बीच टीवी का बिगड़ जाना मुझे खिन्न कर गया, जो मेरे चेहरे पर साफ दिख रहा था। अभी मैं सोच ही रही थी कि क्या करूं। मेरी परी अपना गुल्लक लिए सामने खड़ी थी, “मम्मा, तुम परेशान मत हो, इसमें बहुत सारा पैसा है टीवी बन जाएगा।”

मेरे चेहरे से अब परेशानी लापता हो चुकी थी, उस पल की अपनी भावुकता को मैं शब्दों का जामा पहनाने में असमर्थ हूं, बस इतना कि बिना लागलपेट उसने शेयरिंग और केयरिंग का महत्वपूर्ण पाठ मुझे सिखा दिया।

 

– सोनी सिंह


 

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