Fiction

रूपांतरण

manthan- CelebrateLife

अनामिका अपनी बीती कहानी सोचती हुई ख़ामोशी से बिस्तर पर लेटी हुई है और पास ही किसी के रोने की आवाज उसे बार-बार अपनी कहानी पर रोने को कह रही हो ऐसे जैसे वो कभी नहीं रोइ, तब भी नहीं जब उसके पिता का देहांत हुआ, जब उसने अपना प्यार खोया, जब उसकी असफलताओं ने उसे दुनियां की भीड़ में खोने को मजबूर कर दिया, पर आज वो उस आवाज से आवाज मिला कर रो लेना चाहती है जिससे उसके दिल का बोझ कुछ हल्का हो जाए…  

सामान्य माध्यम वर्ग की अनामिका का बचपन अपने पिता के साथ ही बिता था जब उसकी माता उसे जन्म के कुछ सालों बाद ही छोड़ कर इस दुनियां से चली गई। घर में दूसरा कोई भी सदस्य नहीं था न ही कोई छोटी बहन या बड़ी बहन, न ही मामी या चाची, जो उसे उसके नारित्व का बचपन से एहसास करा पता। वो बिल्कुल अपने पिता पर गई थी पास पड़ोस के लोग बचपन में उसे लड़का ही समझते थे। वही रौबदार मर्दानी चाल, चौराहों पर बैठकी, और लड़कों के खेल। अनामिका को कभी अहसास ही नहीं हुआ कि उसकी दुनियां अलग हैं जिसे वो सवार या बुन सकती हैं।
बड़े होने पर उसे इतना एहसास जरूर हुआ कि उसमे कुछ तो अलग है जो उसके साथी उसे किसी दूसरी नजर से देखते है जब वह श्रृंगार धारण कर उन से मिलती है। लम्बे बालों को खोल जब वह माथे पर काली छोटी सी बिंदी लगाती है, कभी जब वह नथ पहन कर अपनी सज्जा में चार चाँद लगाती है ठीक वैसे ही जैसे कभी किसी कहानी की नायिका दर्पण के सामने खुद को निहारती हुई दर्प से कह उठती है कि वो चाँद से बेहतर हैं।
जब वो अपनी मेडिकल की पढ़ाई पुरी ही करने वाली थी तो एक दिन उसे एक खत मिला और उसे पता चला की उसके पिता का देहांत हो गया है। नारी मन ने एक बार भी किसी ठौर की आस में उसे रोने को मजबूर नहीं किया। उसे बल्कि अच्छा लगा की उसके पिता का देहांत हो गया क्योकि कुछ दिनों से उसके पिता की तबियत ख़राब थी। कैंसर की बीमारी ने उनके शरीर को विदीर्ण कर दिया था और अब उनके जीवन में दुःख के आलावा कुछ भी नहीं बचा था। अपने चाचा को फोन कर उसने उनका दाह संस्कार स्वयं किया और जीवन के एक अद्ध्याय का अंत किया।
अपनी डॉक्टरी की प्रैक्टिस के दौरान उसका सोहन के साथ पहला प्यार आज उसे सबसे ज्यादा याद आ रहा था जब उसने सोहन को केवल इस लिए छोड़ दिया था क्योकि दोनों को अलग अलग शहर में नौकरी करनी थी। सोहन कहता रह गया था कि अनामिका अपने बचपने और लड़कपन से बाहर आ जाओ। तुम आज मुझे केवल इस लिए छोड़ रही हो कि मुझे अपने परिवार को देखने के लिए किसी और शहर में काम करना है। कल शायद कहीं तुम्हारे साथ ऐसा हो गया तो तुम समझोगी की रिश्ते मुश्किलों में बनते है न कि मर्जी से। अनामिका ने कभी भी सोहन के बारे में दुबारा नहीं सोचा, आज बंद कमरे में अपने बिस्तर पर सोहन को याद करते हुए उसे एहसास हो रहा था कि वो उस से आज भी शायद उतना ही प्यार करती हैं।
प्रेक्टिस के बाद उसने अपनी डॉक्टरी ज़माने के लिए सरकारी अस्पताल की जगह प्राईवेट हॉस्पिटल ज्वॉइन किया। लेकिन उसे उस समय एहसास नहीं आया कि उसके सपने आसमानों से गर्त में पहुंच रहे है। वो प्राईवेट अस्पताल में केवल एक कठपुतली बन कर रह गई थी। मैनेजिंग डायरेक्टर्स के इशारे पे सारा खेल होता था और डॉक्टरी तो दूर दूर तक कही नहीं थी था बस व्यापर जिसे वो कभी न तो पूरी तरह अपना सकी न छोड़ ही पाई।

आज अँधेरे कमरे में अपने विस्तर पर लेटी वो ये सब याद कर रही थी और ये भी नहीं जानती थी कि  कब तक याद करेगी। उसे रोने की आवाज और तेज सुनाई पड़ने लगी थी और अब वो उस युवती से मिलना चाहती थी जिसने आज उसके नारित्व को जागृत किया था। वो उस के गले मिल के रो लेना चाहती थी चाहती थी की कि उसका सहारा ले कर वो फिर से उठ खड़े होने की प्रेरणा पा जाए। वो उठती है और देर तक आईने में अपने चेहरे को निहारती हैं।

– सिद्धार्थ ‘शून्य’

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