Motivation

अमृत वाणी -१

एक बृद्ध अपने बुढ़ापे पर हर दिन रोता रहता था। आने जाने वालों से अपने जवानी के किस्से सुनाता नहीं थकता था। वह कितना रसूक वाला था, कितनो का रुका काम उसने चुटकियों में करवा दिया। कितनो का बेड़ा पार लगवाया। उसके दवाज़े पर मांगने वालों की जितनी भी भीड़ हो वह सबको ही कुछ कुछ देता ही था। औऱ अब जब कि उम्र में नब्बे का हो चला है, उसका शरीर निर्बल है और लोगों का आना भी कम हो गया है। तो कोई अपनी समस्या लेकर ही आता है और ही जिनकी समस्या उसने हल की थी वो ही मिलना पसन्द करते है। हाय रे दुनियां!! सबका किया भूला देती है।

 

Amritwanwani.celebratelife

एक रोज़ एक संत दवाज़े पर पहुँचा औऱ कुछ खाने का हो तो अग्रहपूर्व भोजन कराने को कहता है। बूढ़ा दरवाज़े पर बैठा था उसने तुरंत ही रुपये संत को देने लगा , तब संत मुस्कराते हुए कहता है के इन पैसों से मोह बड़ी मुश्किल से जाता है अब इसकी आदत  नहीं है बाबा, कुछ भोजन कराएं। बृद्ध ने देखा संत की उम्र कुछ ज़्यादा थी , तपाक से बोला इस उम्र में जहां तुमको दूसरों की सेवा करनी थी वहां तुम ख़ुद के लिये ही मांग रहे हो। संत सौम्यता से उत्तर देता है, ‘ बाबा जो सबकी सेवा करता है उसकी ही तो सेवा कर रहा हूँ,आख़िर जब शरीर काम करना बंद कर देगा तब कौन जानने वाला होगा मेरा,मेरे प्रभु के अलावा। मन रमता है तो शरीर झक मार कर पीछे दौड़ता है।‘ 

 

बूढ़े को बात समझ गयी। उसने अपना मन भी राममय करलिया। 

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