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अमृत वाणी -२

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उत्तर के एक गांव में जाति के आधार पर कुँए बाटे गए थे। गांव में कुँए दो समुदायों में बाट दिए गए थे। ऐसा न था के लोग छुआ-छूत में फसे हुए हो। एक दूसरे से मेल मिलाप तो था पर पीने के पानी को वो छू नहीं सकते थे। जहाँ एक कुआं बहुत मीठा पानी देता था वहीं दूसरे के पानी में वह स्वाद न था। यह बटवारा इस तरह हुआ के एक रोज़ किसी नौजवान को स्वप्न में भगवान ने दर्शन दिए और अपनी इच्छा बताई के जो भी कुँए के पानी को दूसरे समुदाय को छूने देगा फिर भगवान उस जाति के किसी भी व्यकि से प्रसाद ग्रहण नहीं करेंगे।फ़िर क्या था, अगली सुबह ही पंचायत ने निर्णय दे दिया के जातियां अपने-अपने कुँए की पहरेदारी करे और सबने ही एक मत से बात मान ली आखिर भगवान को नाराज़ तो कोई नहीं कर सकता था।

फिर एक बार अकाल सी स्थिति हो गई l दिन गुज़रते ही जिस कुँए का पानी मीठा था पर गहरा भी वो कम ही था, पहले सूख गया। पर किया भी क्या जाए, प्रभू ने बोल रखा था के पानी तो अपने-अपने कुँए का ही पीना होगा। फ़िर एक दो रोज़ बीतने पर उसी नौजवान को पुनः स्वप्न आया, भगवान ने दर्शन देकर कहाँ है के अकाल आया ही इसलिए के पानी चोरी छिपे किसी ने पी लिया है और अब जब अपवित्र हो ही गया है तो पानी कोई भी पियें दोष नहीं लगेगा। भगवान की इच्छा थी के मिल कर मीठे पानी का एक और कुँआ गांव में खोदा जाए।

बात सबको समझ आगयी थी के मीठे पानी का कुँए जो के बहुत कम गहरा था , को बचाये रखने के लिए उस व्यक्ति ने भगवान और स्वप्न में उनके दर्शन की बात कही थी, और साल दो साल बितते ही उस व्यक्ति ने पुनः तरकीब निकाली और बात भगवान की इच्छा कह के सबको बताई।

भगवान के नाम से इस तरह का खेल बहुत पुराना है। भगवान तो बस भक्त को खोजते हैं उसकी जाति से भला उनकों क्या आपत्ति होगी। वैसे ही जैसे माता का मोह पुत्र होने भर से होता है, उसके लिए सारी संताने उसकी हाड़ मांस से ही बनी हैं।

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