Fiction

बचपन वाला बर्थडे

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अपने इस जन्मदिन पर रूपा ने बहुत तैयारियां की थी। पिछले कुछ सालों से वह जन्मदिन मनाती तो थी पर बस एक रूटीन था सो मना लिया पर इस साल वह जैसे बचपन मे पहुँच गई थी, और ऐसा इसलिए भी था के इस साल उसका छोटा भाई, रूपेश, उसके घर आ रहा था। शादी के इतने सालों बाद वह कब नव-विवाहिता से उम्रदराज़ महिला बन चुकी थी इसका उसको भी अब ठीक-ठीक अंदाज़ा नहीं था। पर आज वह न चाहते हुए भी बच्चों सी चहक रही है। घड़ी की तरफ़ देखे जा रही हैं तो कभी दरवाज़े पर खड़ी हो जा रही है। भाई के पसंद की सभी डिशेज़ उसने बना ली थी, भाभी का मन रखने के लिए उसके पसंद की ही केक आर्डर की है। उसने घर भी बहुत सलीके से सजाया है। भाई -भाभी दोनों को साफ-सफई बहुत पसंद है। रूपा को आज याद आ रहा है के कैसे बचमन में भाई-बहन की लड़ाईयाँ हुआ करती थी, रूपा गंदगी करते नहीं थकती और भाई साफ़ करके ही दम लेता। रूपा याद करने लगती है के कैसे मायके में मनाया उसका आख़िरी जन्मदिन जब रूपा औऱ रूपेश खूब लड़े थे।बात बढ़ती गयी, तू-तू ,मैं-मैं रुक ही नही रही थी, रूपेश कह रहा था,’ अब तेरी शादी लग गयी है, तू अपने घर जा कर गन्दगी करना’ और रूपा कहे जा रही थी,’ मेरा ये ही घर है जैसे मन वैसे रहूंगी।’ लेकिन माँ ने जैसे ही ये कहा के,’जाने दे रूपेश हमारे साथ मनाई इस आखरी जन्मदिन पर तो इसे अपने मन का करने दे।फिर तो यह घर इसके लिए पराया हो जाएगा।’ वह बहुत रोई। खाना तक़ नहीं खाया धीरे-धीरे शाम होने आयी फिर भी कमरे से बाहर नहीं आ रही थी। दोस्ते, पड़ोसी, रिश्तेदार पहुँचने लगे। तब भाई ने मोर्चा संभाला, और सबसे पहले उसके पसंद का गाना लगा दिया गया । संगीत रूपा का मूड बनाती थी, वह अक्सर हर मौके के लिए गाना चुन-चुन कर बजाती। मैथ्स पढ़ने से पहले ग़ज़ल की कैसेट्स तो ड्रॉइंग करते वक़्त तेज़ संगीत। याद करना हो तो पहले किशोर कुमार। अब आज जैसे ही मूड के हिसाब से भाई ने संगीत चुन कर बजाया वह सीधे भाई के कमरे में पहुँच कर दोबारा आमने-सामने की लड़ाई शुरू ही करने वाली थी के भाई ने पेपर में लपेटा हुआ एक तोहफ़ा उसको पकड़ा दिया, बोला;’गिफ्ट देरहा हूं इस बार,सोचा जाते-जाते कुछ दे दूं।’ तपाक से उसने पेपर फेंक कर देखा, सूट का कपड़ा था। यह क्या भाई जिसे अपने कपङे ख़रीद सकने की समाझ नहीं वह आज उसे लिए सूट पसंद कर लाया है। कहता है बढ़िया डिज़ाइन में स्टिच करवा लेना। तभी अतीत की लड़ी टूटती है और छोटा भाई सालो बाद जन्मदिन पर मिलने आया है। 

 

रूपेश अब ऑस्ट्रेलिया में सेटल था पत्नी भी वही थी। बहुत सालो बाद आया था। देखते ही दोनों बस खो से गये,बचपन की यादों में। रूपेश अब बहुत बदल गया था। बात-बात पर सुना नहीं रहा था जबकि रूपा की  बहुत बड़ाई ही कर रहा था। शाम ऐसे ही रात बन ढल रही थी । रूपा के पति भी अब हमारे साथ थे। अब दोनों मर्द आपस में बाते कर रहे थे और महिलाएं एक दूरसे में रम गए थे। इन सब के बीच, रूपा के मन में बार-बार ये ही ख्याल आ रहा था के देखूँ भाई मुझे क्या गिफ्ट देगा।  केक खाने के बाद भाभी ने हाथ मे लिया पैकेट मुझे थमाते हुए कहा,’लीजिये दीदी आपके लिए।’रूपा ने हँस कर थैंक्यू बोला और गिफ्ट को टेबल पर रख दिया। बाक़ी काम भी उनके सामने ही निपटा दिया जिससे भाई के जाते ही लपक कर कमरे में आगयी और पैकेट निकाला। ढेर सारी सीड्स थी, हर किस्म के गानों की। छोटा सा पोर्टेबल म्यूजिक सिस्टम भी था और साथ रखे कार्ड पर लिखा था, ‘मैं शायद तुम्हारी ज़िन्दगी तो नहीं बदल सकता पर मूड हमेशा अच्छा करने की गारंटी तो दे ही सकता हूँ। तुमसे जन्मदिन पर मिल रहा था ये मेरे लिय बहुत बड़ी बात रही।  बचपन की यादों का कोई मोल नही। मेरी प्यारी दीदी।’

 

कितना कुछ था इस गिफ्ट में, बिल्कुल कस्टमाइज। कोई आपको समझता भर हो तो आपका मनोबल बढ़ जाता है। ऐसे सकारात्म ऊर्जा देने वाले नाते-रिश्ते ही तो ज़िन्दगी का आधार है।

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