Fiction

दहेज़

Dowry_celebratelife.in

आईये, आईये, आईये….

ये दिल का बाजार है हुजुर

कुछ तो लेते जाईये…

क्या जज्बात लेंगे ?

हाँ मिलेगा ना! कीमत है चंद आसूं

नफरत लेंगे ?

कीमत है चार गालियाँ.

कटाक्ष और तिरस्कार भी मिलेगा …

पर ये महंगे पड़ेंगे बाबु , पहले दिल में बसना पड़ेगा फिर दिल तोडना पड़ेगा !

 

और इसके साथ ही हॉल तालियों की गडगडाहट से गूंज उठाI ना जाने मिरु ने कितनी ही बार ये पंक्तियाँ पढ़ी होंगी , ना जाने कितने ही मंचो से । न जाने “उसने” कितनी बार कितने ही लोगो के मुंह से सुनी होंगी। हर बार इन शब्दों ने उसे उतनी ही पीड़ा दी होगी, हर बार इन शब्दों ने उसका उतना ही दिल दुखाया होगा । आखिर “उसे” ही तो पता था इन पंक्तियों का सच, जिन्हें मृणालिनी ने लिखी थी उसकी ही खातिर। जिन्हें सुनाने के बाद वो शादी के मंच से उठ कर चला गया था, जिन्हें सुनने के बाद उसने शादी से इंकार कर दिया था ।

उसके जैसा श्रोता फिर कभी न मिला मिरू को, फिर किसी ने इतने धैर्य से नहीं सुना उसे, फिर किसी के ह्रदय पे उसके शब्दों ने ऐसा आघात भी नहीं किया । म्रदुभाषी तो मृणालिनी कभी थी ही नहीं, लेकिन “उसने” उम्मीदें कुछ और रखी थी अपनी मिरू से । यही कारण था शायद कि उससे ये कटाक्ष बर्दास्त नहीं हो सका जब उसके विवाह समारोह में मिरू ने उपहार स्वरुप ये पंकितियाँ पढ़ी, और वो समारोह से चला गया । उम्मीदें हाँ बस उम्मीदें ही तो थी शायद जो उन दोनों को बंधे रखती थी ।

 

आज पांच साल हो चुके है, किसी ने मृणालिनी कि कोई खबर नहीं ली, किसी मित्र ने नहीं, किसी रिश्तेदार ने नहीं, “उसने” भी नहीं । अब तो मृणालिनी कितने मंचो से अपनी कितनी ही कविताये पढ़ चुकी है, न जाने कितने श्रोता आये होंगे बस कोई अपना कभी नहीं आया । अब उस तक पहुचना कितना आसान था, दिल्ली आकार शायद दो चार पूछ ताछ में ही पता मिल जाता , फिर भी कोई नहीं आया । विवाह से निकल कर मिरू ने खुद को छ: महीने घर में बंद रखा और फिर उसने शहर और लोग दोनों ही पीछे छोड़ दिये, उसने भी तो कभी किसी से संपर्क नहीं किया “उससे” भी नहीं ।

 

शर्मा जी : मैडम जी नाराज़ नहीं हो तो एक बात कहूँ ?

मृणालिनी : कहिये

शर्मा जी : मैडम मंत्री जी का फिर लखनऊ से फ़ोन आया था , कह रहे थे फ्री में थोड़े ही बुला रहे है , मैडम से बोलो प्रोग्राम के अछे पैसे दिलवा देंगे।

मृणालिनी : कितने ?

शर्मा जी : 6 लाख

मृणालिनी : चलिए चलेंगे

शर्मा जी : क्या मैडम सच में ? फिर हाँ बोल दूँ ?

मृणालिनी : मैं एक ही बात दस बार नहीं बोल सकती , कब है प्रोग्राम ?

शर्मा जी : जी अगले महीने कि 15 को , मैं सारे इंतजाम करवा देता हूँ फिर ।

 

मृणालिनी ने सोचा अब राकेश से मिलना ही ठीक रहेगा , न जाने वो कैसा होगा , कहाँ होगा , शादी तोड़ने के बाद उसके पिता जी ने उसे घर में स्थान भी दिया होगा या नहीं।

 

5 साल पहले ..

मृणालिनी , मिरू ओ मिरू सुनती हो कहाँ गयी ?

मृणालिनी : राकेश जी , बड़े क्षोभ के साथ बताना पड़ रहा है कि मृणालिनी जी अब इस दुनिया में नहीं रहीं , उनका आज शाम 6 बजे देहांत हो गया ।

राकेश (हंस कर) : क्या कहती हैं मैडम ? बिना डॉक्टर को दिखाये ही आपने उन्हें मृत कैसे समझ लिया जरा हाथ पकडाए तो नब्ज देखने दें मरीज की… (कहते हुये राकेश ने मृणालिनी कि कलाई पकड़ी और नब्ज देखने लगा)

मृणालिनी : छोड़ो मुझे कोई बात नहीं करनी तुमसे , अब भी क्यूँ आये ? ना आते , वही रह जाते ।

राकेश : देखो डॉक्टर साहिब के छुते ही मरीज़ उठ गया , क्या मैडम आप तो जीते जी इनका अंतिम संस्कार करवा देतीं!

मृणालिनी : (हाथ छुड़ा कर खिड़की के पास जाते हुये) रहने दो राकेश मैंने उम्मीदें ही गलत लगा लीं, माँ – बाबुजी के बाद तुम्हारे सिवा किसी से मतलब ही नहीं रखा , गलती कर दी ।

राकेश : बस करो मिरू , पूछा भी नहीं कि मैं क्यूँ नहीं आ सका … आज एक बच्चे का ऑपरेशन है , अभी तक उसे बहार ही रखा है , बिना पैसों के छूने नहीं देंगे , कितने दरवाजे खट-खटाने के बाद तुम्हारे पास आया हूँ ।

मृणालिनी : ओह समझी! काम से आये हो, कितने चाहिये ?

राकेश : (मुस्करा कर) ऐसे ही दे दोगी ? ये भी ना पूछोगी कि मासूम को हुआ क्या है? देखने नहीं चलोगी मेरे साथ?

मृणालिनी : (चेक निकलते हुए) कितने का बनाऊ ? देखने तो चलूंगी , देखूं भला किसने मेरी पिक्चर की टिकटें बर्बाद करवा दीं, डाक्टर साहिब को फ़ोन करने तक का वक़्त नहीं दिया , कम से कम टिकट तो ब्लैक में बेच आती।

राकेश (मृणालिनी को अपनी ओर खीचते हुये) हाय आपकी इन्ही अदाओं पे तो हम जिंदगी लुटाये बैठे है, तो आप टिकट ब्लैक कर के इस कोठी को खरीदें बैठी हैं ?

मृणालिनी : (दूर हटते हुये) अब ऐसे समय में क्यूँ वक़्त बर्बाद करते हो ? कहो तो कितने का बनाऊ ?

राकेश : 25000

मृणालिनी : बस ? मुझे नहीं समझता कोई इतने से पैसों के लिए किसी कि जान कैसे ले सकता है ? ये कैसा अस्पताल है भला ?

राकेश : और ये लगा मिरू का कटाक्ष पिता जी पर । तुम्हे तो पता है ना उन्हें पैसों से कितना प्यार है और उसे कमाने के लिए ही तो उन्होंने अस्पताल बनवाया है ।

वर्तमान :

मृणालिनी : शर्मा जी पैसे एडवांस ले लीजियेगा , मंत्री लोग हैं बाद में नहीं निकलवा सकेंगे ।

पैसा ! हाँ यही तो सबकुछ है आज दुनिया में, यही तो है जो जिंदगी बनता , बिगड़ता और ख़तम कर देता है!

5 साल पहले :

राकेश : माँ मैं पहले ही कह चुका हूँ , मृणालिनी के सिवा मैं और किसी से विवाह नहीं कर सकूँगा ।

माँ : हाँ मार डालो पिता जी को !

राकेश : क्यूँ भला , मेरे विवाह से उनकी मृत्यु का क्या सम्बन्ध ?

माँ : उससे तो नहीं हो सकेगी , देख लो इनमे से जो पसंद हैं बतला दो ।

पिताजी : (अन्दर आते हुये) सुनती हो राकेश कि माँ , कल मिश्रा जी के तरफ से लोग आ रहे है , पच्चास लाख में बात पक्की हो गयी है । तैयारियां कर लेना ।

राकेश : मातलब मेरी कीमत लगा दी गयी है । मुझे बेचने का इंतजाम कर दिया गया है ।

वर्तमान :

आईये, आईये, आईये….

क्या कहते हो बाबुजी ? पैसे चाहिये ?

इस दिल के बाज़ार में पैसे खोज रहे हो ?

क्या रास्ता भटक गए हो बाबु ?

क्या कहते हो ….

ये जज्बात , ये सच , ये धैर्य , ये तिरस्कार , ये त्याग ,  ये करुणा , ये उपहास , ये चैन , ये अपनत्व ये सब तुम्हारे किसी काम के नहीं ?

जाओ साहब जाओ

दिल के बाज़ार में पैसों का मोल करने आते हो ?

क्यूँ मुझ गरीब का मजाक उड़ाते हो !

मृणालिनी मंच से उतर कर सीधे कार कि तरफ बढ़ी । वो इतनी दूर आगयी और राकेश फिर भी नहीं आया ? उसे देखने, उसे सुनाने! सब ठीक तो हैं ? राकेश तो कभी इतना दृढ हृदय नहीं था ! ये तो मृणालिनी कि ही प्रतिभा थी बस , भावनाओ में ना बहने कि ! सब ठीक तो होगा , कहीं कटाक्ष ने कोई बुरा तो नहीं किया , कहीं मृणालिनी के हाथों कुछ अनर्थ तो नहीं हो गया !

शर्मा जी : (रास्ता रोकते हुये) मैडम जी कहाँ जा रही हैं ? यहाँ कोई साक्षी जी आयीं है । कितनी बार समझाया कि आप किसी से नहीं मिलती , कहतीं है मैडम से एक बार कह दो कि मैं राकेश जी के यहाँ से आयी हूँ वो ज़रूर मिलेंगी ।

मृणालिनी का दिल धक् से रह गया । साक्षी ? राकेश के वहां से? ये क्या कह रहे हैं शर्मा जी ? चलिये तो कहाँ है वो?

साक्षी एक पतली दुबली महिला थी । लाल साड़ी , मांग में सिन्दूर हल्का श्रींगार ।

साक्षी : नमस्ते मृणालिनी जी ! जब सुना कि आप लखनऊ में हैं , तो सोचा आपका सामान आप तक पंहुचा दूँ !

मृणालिनी : (राकेश को खोजते हुये , समझते हुए कि यहाँ सामान का पर्याय वास्तु से नहीं बल्कि राकेश से ही है) कहाँ है वो ? ठीक तो है ? आया है क्या ?

साक्षी : नहीं वो तो नहीं आ सके I पाण्डेय जी ट्रंक अन्दर ले आईये जरा । विवाह के बाद जब कमरे में गयी तो वहां हर जगह आपका ही सामान था, लगा जैसे कमरे में ये नहीं शायद हर जगह आप ही थीं! पूछने पे इन्होने कहा जला दो उसका सामान , अब वो नहीं आएगी कभी। जला देती ! लेकिन जला देने भर से तो आपको कमरे से नहीं निकाल पाती , इतना तो मैं समझ गयी थी, सो मैंने मेरे लिए गेस्ट रूम खुलवा लिया ।सुना कि आप लखनऊ में हैं तो सोचा सामान दे दूँ आपको , कई कीमती सामान भी हैं।

 

मृणालिनी : (सोफे पर बैठते हुये) राकेश तो शादी को मन कर के चला गया था ?

साक्षी : जी! मगर उनके पिताजी ने पैसों कि दुहाई देकर वापस ले आये ।कहा कि दहेज़ के पैसों से अस्पताल बनवाया जा चुका है । अब कुछ भी वापस नहीं किया जा सकता । शादी के लिये हाँ सुनाने पर ही उन्होंने पैसे लिए । अब यह सब नहीं चलेगा ।

मृणालिनी : (उठ कर खड़े होते हुये ) शर्मा जी मैडम के लिए चाय नाश्ते कि वाव्स्था अभी तक क्यूँ नहीं हुई ? साक्षी सामान पहुचने के लिये धन्यवाद् । शर्मा जी आगे 6 महीने के शो कैंसिल कर दें, आगे मुझसे पूछ कर ही प्रोग्राम रखे ।

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