My Legacy

मेट्रो में जीने का सबक

Train - मेट्रो में जीने का सबक

बनारस जैसे मस्तमौला शहर से अचानक मैं भागती-दौड़ती मुंबई में आ गई थी। यहां के तौर-तरीके वहां से बहुत अलग हैं, इसका आभास मुझे जल्द ही हो गया, लेकिन यह समझते भी देर न लगा कि यह शहर आपको कदम दर कदम यहां जीने का पाठ भी खुद ही पढ़ा देगा।

सो, शहर से कदमताल की कोशिश जारी थी। यहां आए कुछ महीने बीते थे। दोपहर का वक्त था और मैं ऑफिस जाने के लिए निकली। फर्स्ट क्लास का डिब्बा (लोकल ट्रेन) आज कुछ ज्यादा ही खाली था। एक परिवार और दो-तीन लोगों के अलावा कोई नहीं था। अमूमन इतनी खाली ट्रेन मिलना मुश्किल ही है। मन ही मन प्रफुल्लित हुई कि मस्त सोकर सीएसटी (छत्रपति शिवाजी टर्मिनस) तक का सफर कटेगा।

एक परिवार बातचीत में मग्न था। मैंने कुछ अनमने ढंग से उन्हें देखा और आगे बढ़ कर उनसे दूर जगह तलाशने लगी, ताकि नींद में खलल न पड़े। एक कोना ढूंढ लिया मैंने और चप्पल उतारकर सामने की सीट पर पैर पसारकर आराम से बैठ गई। अभी आंखें मूंद निद्रा देवी की गोद में पसरने की तैयारी ही थी कि कानों में किसी के रोने की आवाज आई। मैंने पहले अनसुना कर दिया, फिर लगा यह किसी बच्चे नहीँ बल्कि वयस्क की आवाज है।

सिंसकियां तेज हो रही थीं। मेरे अंदर का बनारसीपन अनदेखी को नहीं माना, तो मैंने गर्दन घुमा कर उस दिशा में देखा। बिल्कुल कोने की सीट पर एक बीस-बाइस साल की लड़की बैठी रो रही थी। उसे एक नजर देखकर ही अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं था कि वह फर्स्ट क्लास की यात्री तो कदापि नहीँ है, बल्कि पहनावे से ऐसा आभास हो रहा था कि वह सामान्य वर्ग में भी यात्रा करने में अक्षम होगी।

पैसों की तंगी भी उसके रोने की वजह हो सकती है, मेरे मन में इस तरह के ख्याल कुलबुलाने लगे। मेरी बच्ची काफी छोटी है और ऑफिस के कारण उसकी देखभाल में खासी दिक्कत आती है, क्यों न मैं इसे घर पर रख लूं…अगर लड़की के रोने की वजह आर्थिक तंगी है, तो इस तरह उसे आशरा मिल जाएगा। अपना ख्याल बुन गर्व में फूली मैं अभी उठ कर उसकी ओर मुड़ी ही थी कि वह जोर-जोर से चिल्लाने लगी।

वह क्या बोली स्पष्ट नहीं हुआ और मुझमें अब जानने की ललक भी नहीँ बची थी। उसके इस रूप से घबराई मैं दरवाजे की ओर लगभग भागी। अब तक वह परिवार बैठा बातचीत कर रहा था, शायद उन्हें भी लास्ट स्टेशन तक जाना था। पासा ऐसा पलटा कि उस परिवार के समीप बैठने में ही मैंने भलाई समझी। उनकी बातचीत अब मुझे परेशान नहीं कर रही थी, बल्कि भारी मन को राहत दे रही थी। वैसे भी नींद छूमंतर हो चुकी थी। मैंने इस “लोकल सबक” को आत्मसात कर लिया था। यकीन मानिए आज भी यदाकदा कोई रोता हुआ शख्स ट्रेन में टकरा जाता है, तो हृदयहीन सी मैं उससे मुनसिब फासला बनाकर बैठ जाती हूं।

जगजीत सिंह की गजल है,

“पत्थर के शहर, पत्थर के खुदा, पत्थर के ही इंसां पाए हैं…”

यह शायद इस शहर पर फिट बैठता है, भीड़ दिखती तो है, पर सभी अकेले हैं और शायद भलाई भी इसी अकेलेपन में है।

-सोनी सिंह

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