My Legacy

संस्कारी बहू

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मेरी इस कहानी में जो मेरी सहेली है, वो आदर्श भारतीय नारी से ज़रा भी कम नही है। बहुत ही स्नेही, शुशील, माम्तत्व से भरी है वो, दया तो उसका विशेष गुण है। उसके गले का नौलख्खा हार है दया। दिखने में भी बला की खूबसूरत है वो। मेरी सबसे प्रिये सहेली।

लेक़िन कहानी उसके व्यक्तित्व की व्यख्या नहीं करेगी। उसके जीवन साथी के स्वार्थी व्यवहार और ससुराल वालों की उपेक्षा ही केंद्र में है। आख़िर क्या चाहिए पति को और उसके विस्तृत परिवार को। एक अबला ही तो चाहिए, जिसमे संस्कार हो भारतीय संस्कार। हां क्या संस्कार है यह, लड़की ये ही मान कर जिये के लड़की की डोली घर से विदा हो गयी तो ससुराल से अर्थी ही निकले, वो जीती-जागती ससुराल छोड़ कर नहीं आ सकती। और दूसरा, संस्कार के बंधन सात जन्मों का बंध चुका है तो निभाते रहिये, इस जन्म में नही तो प्यार और सम्मान अगले जन्म में पक्का मिलेगा। वेरी प्रॉमिसिंग, नही क्या।

भारतीय संस्कारी बहु सास ससुर तो छोड़िए, रिश्तेदारों को भी सिर माथे रखे। लेक़िन अगर बदले में पति की दुत्कार मिले और स्नेह की जगह छल- फिर क्या करना होता है एक संस्कारो वाली बहू को? जी हां, सहना पड़ता है। मन बड़ा करना पड़ता है। सात जन्मों के लिए उसे निभाना है आखिर। शादी आखिर अग्नि के समक्ष सात फेरों से हुई है, सौगंध ली गयी है। और पति तो बस इसीलिए जबाबदेह नही क्यों के वो पुरुष है, ऐसा तबक़ा जो नीचता की कोई भी हद पार ले, छि छि कर भी दे लोग, लेकिन दुत्कार नही देते। आखिर काम का आदमी है।

आज इस विषय पर इसलिए लिखना पड़ा, के पड़ोस की एक आंटी ने कहां के बहुत नीच है फलाने की बहू, और मेरे पूछे बग़ैर ही कारण भी बता दिया। वो ये की बहुत पटर पटर बोलती है। कल आंटी उसकी सासू मां से मिलने गयीं थी। तब बहू ने सास को पलट कर कह दिया के माँ चाय अभी दस मिनिट बाद बनाती हूँ, तब तक ससुर जी भी आजायेंगे, नहीं तो फ़िर बनानी होगी।

“भला बहू के हाथ टूट जाते, जो दो बार बना देती। वो अंग्रेजी मेम।”

हाँ, आज कल संस्कार रहित बहुएं ही तो है हम, जिनको मेम कहा जाता है। आंटी टाइप संस्कारी सासु मां द्वारा।

यहां दुसरो के लिए मर खप जाना ही तो औरतो का सौभाग्य समझा जाता है। ऐसी औरते पति से पहले स्वर्ग सिधार कर सुहागन ही दुनियां छोड़ देतीं हैं।

‘सुखी रहना नियति ने नहीं लिखा, सुख का इंतज़ाम ही तो करती है,आज भी मेरी सखी जैसी कई अंजान सखियां।’

– अदिति


 

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