Fiction

The lost lady : Open Letter

open letter- celebratelife.in
रागिनी की अपने पति के साथ ये पहली लड़ायी है। उसे लगता है शब्दों से भावनाओं को समझाया जा सकता है मगर जब तक घर का सारा काम ख़त्म कर के रगिनी कमरे में पहुँची संदीप सो चुका था। रागिनी अपने सोते हुए पति को जगाने internet पर पहुँच गयी…

एक ख़त!

सोचती हुँ एक ख़त लिख दूँ तुम्हारे नाम।
आजकल वो ओपन लेटर लिखते है, वैसा ही…
देखा है तुम्हें कई बार, देर रात तक मोबाइल पे ना जाने क्या – क्या पढ़ते रहते हो।
कभी-कभी जब मुझे नींद नहीं आती और तुम चैन से सोते हुए अचानक करवट लेते हो, तब भी देखा है तुम्हें हाथ से मोबाइल टच कर के ख़ुद को तस्सल्ली देते हुए, कि खजाना सेफ है, या शायद ये इत्मिनान करना चाहते हो कि राज सारे दफ़्न है…

खैर कारण जो भी हो, चाँचेस है कि ये ओपन लेटर बिना कोई पता या नाम लिखे भी तुम तक पहुँच ही जाएगा। यक़ीन भी है कि मेरी जिस लिखावट के तुम मुरीद हो समझ भी जाओगे की पत्नी कौन है…आखिर तुम्हारी अक़्ल और मेरे कटाक्ष यही तो हमें इतना करीब ले आये और आज तक हमें बाँध कर भी रखा है।

अजीब है ना, जिस कटाक्ष को सुन कर कितने भाग खड़े हुए, तुमने उसी को सराहा। सुना था भगवान शिव ने विश पिया था, दुनिया को बचाने के लिये। मालूम नहीं था की तुम इतने धार्मिक हो। मेरे कटु वचन पर जब मुस्कान तुम्हारे चहरे पे नृत्य करने लगती है, मन में ख़ुद की ही बात को दोहरा कर तय करती हुँ, मीठा बोलना बेहतर है। जब सुधरने लगती हुँ, तो तुम्हारा विचलित मन ना जाने कितने आसुँ रोता है, बिना किसी गलती के तुम माफि माँगने लगते हो, और खुद की गलतियों के लिये भी मैं तुम्हें ही माफ कर देती हुँ!

अब जब सब ठीक है और तुम्हें शिव सा त्यागी बता दिया, फिर ख़त क्यूँ?क्यूँकि कटाक्ष मेरा सृंगार , हठ को मेरा हक़ मान लेना, अपशब्द मेरे आवरण है और बचपना मेरा मान!तुम सरल हो, शान्त हो, गुणी हो, सुविचारी और समझदार भी हो!

और इसलिये “हमारी” बात कुछ और है… माना मेरा वक्तित्व लुभाना है लेकिन मुझे तुमसे प्यार है खुद से नहीं! मेरे जैसे बनकर क्या करोगे मैं हर एक घर में हुँ, मैं हर एक गली में हुँ और हर एक प्राणी में हुँ। मैं हर मानव की तरह अमृत की लालसा रखती हुँ, मेरा मूल्य कुछ भी नहीं है।

विषपान कर के जीवित रहना तुम्हारा ही धैर्य है, क्यूँ आवाज ऊँची कर के अपना महत्व कम करते हो?क्रोध ही तो तुम्हारा सृंगार है, क्यूँ नहीं संयम रखते हो की तीसरे नेत्र के खुलने भर की कल्पना से भी मैं काँप उठूँ?

वैसे सुना है जब गंगा सर्वनाश को निकली थी तो उसे भी शिव ने धारण कर लिया था मस्तक पर…

खैर छोड़ो मैं विष ही बेहतर हुँ!!!

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