Fiction

यशोधरा का बुद्ध को पत्र

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हे प्राणेश!!

सोती हुई मुझे और पुत्र को छोड़ कर ज्ञान प्राप्ति हेतु वन को गमन तो कर गए, बहुत बड़े ‘महात्मा बुद्ध ‘तो बन गए ‘राजकुमार सिद्धार्थ,’ पर क्या मैंने आपको माफ किया होगा? ये प्रश्न तो अनुत्‍रित ही रहा। ये माना जा सकता हैँ कि आपको मुझसे कोई मोह नहीं था पर क्या छोटा सा बालक ‘राहुल’ भी आपके याय़ावारी कदमों को रोक नहीं पाया?

मेरा दुख तो अत्यंत दारूण है और खुद को’ राजकुमार सिद्धार्थ’ के ज्ञान मार्ग में बाधा मानने के लिए तो मैं कतिपय तैयार नहीं हूँ… मैं स्त्री को हीन नहीं मानती। वस्तुतः आपने मुझे जाना ही नहीं… अगर आप मुझे जान जाते तो मुझे यूँ छोड़ कर नहीं जाते।

मेरा कहना केवल इतना सा है कि काश आप मुझे कह कर जाते । क्या मैं आपको रोक लेती? क्या स्त्री का अर्थ केवल ‘वासना की चेरी’ है?

मैं अपने पति के विरह से इतनी व्यथित हो चुकी हूँ  कि शायद मेरी गोद में उनका लाल ‘राहुल’ ना होता तो मैं प्राण ही त्याग देती। परंतु नहीं। मैंने आपके पथ का अनुगमन किया….. . महल में रहते हुए भी एक सन्यासिनी की जिंदगी जी, अपने केश तक मैंने कटवा दिए। सारे भोग विलास से दूर कर लिया था मैंने खुद को।

मुझे पूर्ण विश्वाश था कि एक दिन ‘मेरे हृदेयश ‘अवश्य लौटेंगे और अपनी गृहस्थी का भार भी उठाएंगे।

मेरा मानना है कि  ‘भक्त को भगवान् के पास नहीं जाना चाहिए बल्कि भगवान को भक्तं के पास आना चाहिए।’

जब ‘हे प्रियतम’ आप 6 साल के बाद महात्मा बुद्ध बन कर वापिस लौटे थे तब मैंने पहले आपसे मिलने को अपने पुत्र राहुल को भेज़ा। शायद आपको मेरे त्यागमयी जीवन का पता चला होगा और आप खुद ही मुझे आकर स्वीकार करें…

आप स्वयं मुझसे मिलने आए। आपने आ कर स्त्रियों की महत्ता स्वीकार की और मुझसे माफी मांगी … ये कहते हुए  नारी महान हैँ, ‘नारी मे नर से ज्यादा दो मात्राएँ है’ ।

“अब मेरे पास कहने सुनने के लिए कुछ नहीं बचा है। इसलिए ‘हे नाथ’ आप मुझे भी भिक्षुणी बना लो।”

आपने मेरे त्याग और तपस्या का सम्मान किया और मुझे और राहुल को भी अपने पथ का अनुगामी बना लिया।

By हेमा त्रिवेदी!!

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