My Legacy

एसी कार के बाहर…

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मैंने जब इस गर्म मौसम में कार का दरवाजा खोला, तो खोलते ही राहत मिली। आराम से बैठ कर गाड़ी के आगे बढ़ते ही खिड़की से बाहर स्वतः ही आंखें चली जाती है, तो मैं बाहर देखने लगी। बाहर की धूप  खिड़की से अंदर तो आ रही थी, लेकिन अंदर एसी ऑन होने से महसूस नहीँ हो रही थी। बनारस की सड़कें आपको बहुत धीमा कर देती  है। हम भी धीमे-धीमे चींटी जैसे बढ़ रहे थे। मेरी आंखें हंसते हुए चेहरों पर  अटकती जा रही थी और फिसलते हुए कार की रफ्तार से आगे बढ़ रही थी।

धूप में भी साइकिल चलाते बच्चे, सड़क किनारे जूस पीते लोग, पेट्रोल पंप पर दोस्तों के साथ बाइक पर बैठे लोग-बाग। एक-दो पैदल सवार भी मस्ती में चल रहे थे। कार में अब मुझे वो आराम नहीं महसूस हो पा रहा था, जो दरवाजे से अंदर बैठते ही था। मैं दिल को दिलासा देने के लिए खुद को कार वाली होने की तसल्ली देती रही। ये वैसे ही फोन पर अति व्यस्त रहने वाले थे, थोड़ी बहुत बाते होती रही। हंसने-मुस्कुराने वाली बातों का वैसे ही अभाव बना रहा।  अब तक होटल आ चुका था। हम होटल में अपने टेबल तक पहुंचे और लोगों के साथ बैठ कर दुनिया-जहान की बेरंग बातों पर हंसने-मुस्कुराने लगे। सभी अपने बड़े से फोन पर व्यस्त थे, वातावरण जितना ही भव्य और सुकून देने वाला था, उतना ही नीरस भी।

लौटते हुए मैंने गाड़ी एक ठेले के सामने रोकने का आग्रह किया और फिर गोलगप्पो का पेट भर कर  आनंद लिया। कार की अपनी तरफ की कांच चुपके से थोड़ी नीची कर दी। अब मुझे हल्की गर्माहट बहुत अच्छी लग रही थी। मौसम के साथ तालमेल जो बैठा लिया था। गौर किया तो पैदल चलने वाले ज्यादा  हंसते-मुस्कुराते और पसीने में भी बरगद की तरह डटे हुए दिखे।

घर पहुंचते ही मैंने भी कमरे की खिड़कियां खोल दी। खिड़की से आती हुई हल्की गर्म हवा मन को भा रही थी। उफ!! कार में बैठने का जो सपना था, क्या पता था की पूरा होकर गले की हड्डी बन जाएगा।

काश! जिंदगी पैदल ही कटती। हंसते – मुस्कुराते, पसीना बहाते। किसी बरगद, पीपल या नीम के पेड़ के नीचे सुस्ताते। क्या कहते हैं, क्या आपको आराम में ही खुशी मिलती है या खुश हो तो पसीना बहाना और उसका हवा से सूख जाना भी अच्छा लगता है?

-अदिति

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