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धक्का-मुक्की के बीच भक्ति!

dhakka - धक्का-मुक्की के बीच भक्ति!

नवरात्रि का आज पहला दिन था। बहुत दिनों बाद देवी माता के दर्शन को हम तीन मैं, मां और बेटा शाम को निकल पड़े। मंदिर के रास्ते तक ही पहुंची ही थी कि महिलाओं और उनसे आधी संख्या में आदमियों की भीड़ दिखने लगी। सब तैयार, बातचीत में रमे मंदिर से लौट रहे थे या फिर पहुंच रहे थे। जैसे ही हम मंदिर के प्रवेश द्वार पर पहुंचे, पीछे से एक महिला आई और हमें लगभग धक्का देते हुए हमसे पहले अंदर पहुंच गई। चलिए ये तो होना ही था। हम भी जल्दबाजी में परेशान उस महिला से बस कुछ सेकेंड बाद ही अंदर पहुंच गए और फिर बेतरतीब लाइन में लगभग रुकरुक कर चलने लगे। हर किसी के पास बहुतसी घरेलू बातें थी, बहुत कम ही भगवान का नाम ले रहे थे। कोई अपनी सास की, तो ननद की, तो कोई सीरियल की बात कर रहा था, किसी के पास खाने से संबंधित बातें थीं। इस तरह जमावड़ा माता तक पहुंचा। सब ने हाथ जोड़े, कुहनी से अगलबगल वालों को धक्का मारकर इससे लगभग अनजान बने हुए मां की महिमा गाते हुए फेरे लेने बढ़ गए। यहां भी एकदूसरे को धकेल कर आगे बढ़ने की होड़ थी। पंडित जी प्रॉपर्टी के मालिक की तरह हर आगंतुक को बिना बोले ही आंखों से ही हिदायत देकर भीड़ को आगे बढ़ने और जगह खाली करने को कह रहे थे। मालाफूल और मिठाई बड़े ही अनमने ढंग से भगवान तक पहुंचा कर वापस किया जा रहा था। ये सारे काम भगवान से लगभग 8 से 10 फुट के दूरी से ही संभव था, जो कोई नई बात नहीं।

 

पुलिसिया धक्कामुक्की के बाद हम तीन भी दर्शन से संतुष्ट होकर मंदिर से बाहर निकल आएं।

 

एक अद्भुत आत्मसंतुष्टि का भाव तो था, लेकिन इस उज्जड़ भीड़ और पंडित जी का व्यवहार दिनप्रतिदिन स्तरहीन होता चला जा रहा है। भगवान ही जाने मंदिर का मालिक कौन है! पहले दर्शन पाने को व्याकुल भक्त या भगवान की सेवा में लीन और भक्तों को आंखें दिखाते पंडित जी या गर्भगृह में विराजमान भगवान स्वयं!!!

 

बोलो, बम बम भोले। संकटमोचन हनुमान की जय। दुर्गामाता की जय।।

-Aditi

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